Hindustani

Just another Jagranjunction Blogs weblog

20 Posts

2 comments

Reader Blogs are not moderated, Jagran is not responsible for the views, opinions and content posted by the readers.
blogid : 25317 postid : 1314259

कृषि की समझ

Posted On: 14 Feb, 2017 में

  • SocialTwist Tell-a-Friend

कृषि की समझ

कृषि का सम्बन्ध फसल उत्पादन, पशुपालन इत्यादि से है। फसल उत्पादन में अनाज, फल या सब्जियों, औषधीय पौधों इत्यादि का उत्पादन करना तथा पशुपालन से दुग्ध, उन, मांस इत्यादि का उत्पादन मुख्य रूप से शामिल है।

किसी भी मानव सभ्यता के विकास  का सीधा सम्बन्ध कृषि से है। मानव सभ्यता के विकास दौरान सभ्यताएं वहीं विकसित हुई  जहाँ कृषि  योग्य भूमि एवं जल की उपलब्धता रही। कृषि के महत्व को हम ऐसे समझ सकते हैं की जिस प्रकार से हवा के बिना हम सांस नहीं ले सकते वैसे भोजन या खाने के अभाव में हम जिन्दा नहीं रह सकते। खाना  या भोजन प्राप्ति के स्रोत पेड़ पौधे (अनाज, फल और सब्जियां इत्यादि) और जंतु (दूध के लिए गाय, भैंसे तथा मांस के लिए मछलियाँ, बकरियां इत्यादी) हैं। मानव सभ्यता के विकास के शुरुवात में चुकि मनुष्य की जनसँख्या बहुत कम थी और मनुष्य के लिय जंगल के प्राकर्तिक संसाधन ही पर्याप्त थे। मनुष्य आदिकाल में जंगली जानवरों का शिकार करता था तथा फल एवं अन्य जंगली वनस्पतियों पर खाने के लिए निर्भर रहता था।

लगभग 11500 ईसा पूर्व में मनुष्य ने कुछ पौधों के बीजों को बोना सीखा और यह जाना कि बीजों को जमीन में बो कर उसी प्रकार का पौधा उगा सकते है और अपने खाने योग्य अनाज को उत्त्पन्न कर सकते है। समय बीतने के साथ साथ जंगल को साफ़ कर के बड़े पैमाने पर बीजों को बोया जाने लगा और फसल (एक ही प्रकार के पौधों को समूह में उगाना, जैसे : गेहू के कई पौधे या बीजों को एक ही स्थान पर उगाना) उगाई जाने लगी।

कृषि के इतिहास  पर  नजर  डालें  तो  कुछ  इस प्रकार से देखा जा सकता है। सर्वप्रथम कृषि का पहला सुबूत ईरान लगभग 11500 ईसा पूर्व पहले से मिलता है। उस वक्त जंगली जो, गेहूं, अलसी की खेती इंसानो द्वारा की जाती थी। सीरिया में अनाजों की खेती 9000 ईसा पूर्व पहले की जाती थी। भारत में भी खेती के सुबूत लगभग 9000 ईसा पूर्व के मिलते हैं। उन्ही दिनों चीन में भी धान की खेती होती थी और सिंचाई के साधन भी चीन में प्रयोग किये जाने लगे  थे। अंगूर की खेती भी 8000 ईसा पूर्व पहले पूर्वी यूरोप और पश्चिमी एशिया में की जाने लगी थी। 6000 ईसा पूर्व पहले खेती के तरीके यूरोप में पहुँचने लगी. उसी दौरान यूरोप में घोड़े को कृषि कार्य में प्रयुक्त किये जाने लगे। 5000 ईसा पूर्व पहले अमेरिका में आलू की खेती शुरू हुई। जैसे जैसे कृषि कार्य बढ़ने लगे उसमे उपयुक्त किये जाने वाले औजार जैसे हल, इत्यादि भी किसान तैयार करने लगे जिससे कृषि कार्य आसान होने लगे।

जैसे जैसे एक ही जगह पर खेती करना आसान होता गया मनुष्य लगभग एक ही जगह कबीले बनाकर रहना आरम्भ कर दिया। खेती के साथ साथ जंगली जानवरों का शिकार भी करता था।  समय के साथ ही मनुष्य विभिन्न प्रकार की फसलें जैसे धान (चावल), गेहूं, बाजरा, जौ, सब्जियां इत्यादि फसलों की खेती बड़े पैमाने करना शुरू किया।

शुरुवात में चुकि विज्ञान बहुत विकसित नहीं था इसलिए फसलों की प्रजितियाँ सीमित थी, और जो पौधे या फसल प्राक्रतिक रूप से उगती थी उन्ही किस्मों की ही फसलें उगाई जाती थी। पशुपालन में गाय, भैस, बकरी, घोड़े इत्यादि को मनुष्य अपने इस्तेमाल के लिया पालता ही था। मछलियाँ नदियों , तालाबों, एवं समुद्र से प्राप्त होती थीं। बैलों और घोड़ों से खेती के कार्य किये जाते थे ।

जैसे जैसे सभ्यता का विकास होता चला गया विभिन्न प्रकार की खोजे होनी शुरू हो गई। जैसे सिचाई के लिए , नहरे, खेती में प्रयोग करने वाले औजार जैसे हल इत्यादि। आज के समय विभिन्न प्रकार की फसलें भी विकसित कर ली गयीं हैं और जिन फसलों की खेती होती थी उनमे पौध प्रजनन और जैव प्रौद्योगिकी तकनिकी (Plant Breeding and Bio Technology) के माध्यम से उन्नत किस्मे (plant varieties) विकसित कर ली गयी जिनकी पैदावार छमता ज्यादा है और यह प्रक्रिया लगातार जारी है।

चुकि आज मानव की जनसँख्या बहुत बढ़ चुकि है अतः सबके लिए खाने का इंतजाम करना एक बड़ी चुनौती है।चुकि जमीन सीमित है और विभिन्न प्रकार के सड़क निर्माण, बिल्डिंग निर्माण इत्यादि होने की वजह से खेती योग्य जमीन लगातार कम होती जा रही है। चुकि खाद्यान का उत्पादन जमीन से ही होता है अतः खेती योग्य से पैदावार बढाना ही एक मात्र उपाय है।

कृषि में खेती के महत्व को हम हरित क्रांति के माध्यम से और गहरे से समझ सकते हैं।

सन 1950 से पहले तक विश्व में भूख से बहुत लोग मर जाया करते थे और भुखमरी आम बात हुआ करती थी।दुनिया की लगभग 30 % जनसँख्या को दिन में एक समय का ही भोजन मुश्किल से नसीब होता था। दो जून का भोजन मिलना एक बहुत बड़ी जनसँख्या के लिए सपने ही था। ऐसे में भोजन सभी के लिए उपलब्ध करना एक चुनौती थी। भारत भी इससे अछूता नहीं था। भारत खाद्यान (खाने की सामग्री) जैसे गेहूं, दाल, इत्यादि पर विदेशों पर निर्भर था। भारत में खाद्यान की बहुत कमी थी। इसकी गंभीरता इस बात से समझ सकते है की एक बार अमेरिका ने भारत को धमकी दी थी कि वो भारत को दिए जाने वाले खाद्यान पर प्रतिबन्ध लगा देगा और उस समय के तत्कालीन प्रधान मंत्री श्री लाल बहदुर शास्त्री को देशवासियों से अपील करनी पड़ी थी कि हफ्ते में एक दिन सभी लोग व्रत रहे ताकि उपलब्ध खाद्यान का ज्यादा दिनों तक इस्तेमाल किया जा सके।

आज हम खाद्यान के मामले में लगभग आत्मनिर्भर है कि परन्तु फिर भी हम दलहनी (दालों)और तिलहनी (तेल) उत्पादों के लिए बही भी हम विदेशों पर  निर्भर है और हमें इनका लगातार आयात करना पड़ता है। इसकी चर्चा अगले लेख में करने का प्रयास करूंगा।

जब दुनिया खाद्यान संकट से संघर्ष कर रही थी तब मेक्सिको में एक महान कृषि वैज्ञानिक (Plant Pathologist) डॉ नार्मन इ बोर्लौग ने एक क्रन्तिकारी अविष्कार (innovation) किया। सन 1950 के पहले तक दुनिया में गेहूं और धान की प्रजातियों की लम्बाई बहुत अधिक हुआ करती थी और पैदावार भी कम होती थी। लम्बाई ज्यादा होने की वजह से जब फसल में दाने उत्त्पन्न होते थे तो उनका वजन बढ़ जाता था और यदि उस समय तेज हवा या हलकी भी बारिश हो जाती थी तो फसल जमीन पर गिर जाती। इससे फसल में दाने ख़राब हो जाते थे और उत्पादन बहुत कम हो जाता था।

डॉ नोर्नल इ बोर्लौग ने पौध प्रजनन के माध्यम से  गेहूं की ऐसी किस्म विकसित की जिनकी लंबाई बहुत कम थी . इस किस्म के गेहूं की फसल गिरती नहीं थी। जिसके फलस्वरूप पैदावार में 90 प्रतिशत तक की वृद्धि हो गयी, मतलब लगभग दूने की वृद्धि हो गयी। फिर इन प्रजातियों को पूरी दुनिया में फैलाया गया और सन 1960 से 1970 तक लगभग पूरी दुनिया में खाद्यान उत्त्पदन रिकॉर्ड स्तर पर पहुँच गया। लोगों को खाद्यान की कमी से छुटकारा मिलने लगा। चुकि इस खोज ने पूरी दुनिया में एक नयी क्रांति ला दी थी और अब लोगों को खाने जैसी मूलभूत जरूरत के लिए परेशान होने की जरूरत नहीं थी अतः विश्व में एक तरह की शांति स्थापित हुई। अतः डॉ नार्मन इ बोर्लौग को शांति के नोबल पुरस्कार से सम्मानित किया गया। उनके इस कार्य के परिणाम को हरित क्रांति कहा गया ।

भारत में हरित क्रांति का नेतृत्व डॉ ऍम यस स्वामीनाथन ने डॉ नार्मन इ बोर्लौग के सहयोग से किया।

हरित क्रांति में मूलतः फसलों की प्रजातियों में परिवर्तन कर के उन्नत किस्म के बीजों द्वारा संपन्न किया गया। परन्तु इन किस्मो की खासियत यह थी कि ये उर्वरक के प्रयोग से और भी बेहतर पैदावार देती थी।

पुराने समय में चुकि मानव जनसँख्या कम थी और कृषि योग्य भूमि भी ज्यादा थी तथा पशुओं की संख्या भी बहुत ज्यादा थी इस लिए खेतों के लिए आवश्यक खाद पशुओं के गोबर और मूत्र से मिल जाती थी। सामान्यतया एक साल में एक खेत पर एक ही फसल बोई और काटी जाती थी, परन्तु चुकि कृषि में शोध बढ़ने से विभिन्न प्रकार की फसलें विकसित कर ली गयी हैं और एक ही भूमि पर साल भर में तीन से चार फसल तक बोई और काटी जाती है।

फसल उत्त्पदन के लिए जिन चीजों की आवश्यकता होती है वह निम्न है :

१.       उत्पादक भूमि (Productive soil)

२.       साफ़ पानी (clean water) सिचाई (irrigation)

३.       उन्नत बीज (seeds)

४.       उर्वरक (Manures and Fertilizers)

५.       पेस्टिसाइड(Pesticides)

६.       कृषि यंत्र (Tools and implements)

पौधे अथवा फसल अपने जीवन यापन के लिए जमीन से ही पोषक तत्व प्राप्त करते हैं। वर्षों से एक ही जमीन पर हर साल में कई फसलें उगाने से जमीन में पौधों के पोषक तत्वों में कमी आ गयी। कृषि के शुरुवात से लेकर सन १९०० तक खेतों में पोषक तत्वों की पूर्ति हेतु उर्वरक के तौर पर गोबर की खाद का मूलतः इस्तेमाल होता था।परन्तु विज्ञान के विभिन्न शोधों के फलस्वरूप विभिन्न प्रकार के रासायनिक उर्वरकों का निर्माण शुरू हुआ जिससे फसलों की पैदावार बढ़ गयी। उर्वरकों का खेती में अटूट योगदान है।

पुराने समय से पौधों और फसलों को विभिन्न प्रकार के कीड़े और बीमारियाँ नुक्सान पहुंचती थी और उनके रोकथाम के लिए प्राक्रतिक रूप से उपलब्ध चीजों को जैसे नीम का तेल , नीम की खली, अरंडी और अन्य भी पदार्थों का इस्तेमाल होता होते था। इन्हें घोल बनाकर फसल पर छिडकाव किया जाता था जिसके दुर्गन्ध से कीड़े दूर भागते थे। बीमारियों की रोकथाम के लिए भी नीम के तेल का इस्तेमाल किया जाता था।

परन्तु आज के समय में विभिन्न प्रकार के रासायनिक पदार्थ या दवाइयां उपलब्ध है जिनके इस्तेमाल से लगभग सभी प्रकार के कीड़ों और बिमारियों की रोकथाम संभव है। केवल विषाणु जनित रोगों के लिए ही कोई दवाई नहीं बनी है।

जहाँ तक कृषि में यंत्रों का प्रश्न है तो आज खेती में बहुत बड़े पैमाने पर यंत्रो का इस्तेमाल होता है चाहे खेत की तयारी के लिए ट्रेक्टर, कल्टीवेटर, रोतावाटर इत्यादि हो , फसल बोने लिए सीड ड्रिल, विभिन्न प्रकार के प्लान्टर, फसल कटाई के लिए हार्वेस्टर तथा छिडकाव के स्प्रयेर्स इत्यादि।

उपरोक्त सभी कृषि के अभिन्न अंग है।

पशुपालन में विभिन्न प्रकार के पशुओं का पालन वैज्ञानिक तौर तरीकों से किया जाता है। दुग्ध उत्पादक पशुओं की भी विभिन्न प्रजातियां विकसित कर ली गयी है जिससे ज्यादा से ज्यादा दुग्ध उत्पादन हो सके।

इसी प्रकार अंडे एवं मांस के लिए मुर्गिओं का भी वैज्ञानिक तरीकों से पालन किया जाता है जिससे ज्यादा मात्र में अंडे एवं मांस का उत्त्पदन हो सके। मछलियों का पालन, बकरी पालन इत्यादि भी बहुत विकसित तकनिकी के माध्यम पालन किया जाता है।

जनसँख्या अधिक होने की वजह से कृषि द्वारा उत्तपन्न होने वाले सभी वस्तुओं की मांग अभूत अधिक है अतः आज कृषि के ये सारे अंग बहुत बड़े बड़े उद्द्योगों का रूप ले चुके हैं।

इन सभी कृषि आधारित ये सारे उद्द्योग इसलिए महत्वपूर्ण है क्यूंकि विश्व की लगभग सात अरब जनसँख्या की खाने पीने की आवश्यकता पूरी करनी एय चुनुती है।

आज स्थिति बहुत अच्छी नहीं दिखती है क्यूंकि आज कृषि आधारित सभी खाद्यानो चाहे वो अनाज हों दाले हों ,फल, सब्जियां हों, दूध , मांस मछली जो भी हो उनके दाम बहुत बढ़ते जा रहे है। यह इसलिए है क्योंकि जनसँख्या बढ़ती जा रही है और खेती की जमीन छोटी  रही है अतः फसलों का उत्तपादन जनसंख्या के अनुसार नहीं  बढ़ रहा है। यदि सरकार इनकी व्यवस्था पहले से ना करे तो अफरातफरी मच जाती है। कभी दाल और कभी प्याज की कीमतें अक्सर आसमान छूने लगती है। अतः यदि कृषि में एक और क्रांति नहीं होती तो खाने पीने के सामान फिर से कम हो जायेंगे और स्थिति पहले जैसी भयावह हो सकती है।



Tags:

Rate this Article:

1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (No Ratings Yet)
Loading ... Loading ...

0 प्रतिक्रिया

  • SocialTwist Tell-a-Friend

Post a Comment

CAPTCHA Image
*

Reset

नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments




latest from jagran